डॉ. हैनिमन के जीवन के अंतिम वर्षों के पत्राचार से यह ज्ञात होता है कि इस अवधि में उन्होंने ऑर्गेनन के छठे संस्करण को प्रकाशित करने की पुरज़ोर कोशिश की थी किंतु यह संभव न हो सका। कहा गया है कि हैनिमन अक्सर अपने मित्रों और परिचितों के साथ यह तथ्य साझा किया करते थे कि इस छठे ऑर्गेनन में पोटेंटाइज़शन का नया सिद्धांत निहित है जो हामियोपैथी के लिए एक वरदान तो सिद्ध होगा ही साथ ही होमियोपैथ्स के बीच एक विवाद का कारण भी बन सकता है, जैसा कि पहले भी "क्रोनिक डिसीसेज़" के संदर्भ में हो चुका था। डॉ. बोएंनिंघौसन (Dr. Boenninghausen) इसके बारे में सबसे ज्यादा जानते थे और साथ ही हैनिमन के दो पत्रों के माध्यम से वे एल.एम. पोटेंसी के उपयोग की विधि भी जानते थे किंतु वे इसकी निर्माण विधि से अभिज्ञ थे।

 

हैनिमन की मृत्यु से थोड़ा पहले, उनकी दूसरी पत्नी मैलेनी ने 10 अक्टुबर 1838 को म्युनिच में जन्मी, पाँच साल की एक छोटी बच्ची सोफी बोहरेर (Sophie Bohrer) को गोद लिया था। जब सोफी बड़ी हुई तो मैलेनी चाहती थीं कि उनकी इस दत्तक पुत्री का विवाह बोएंनिंघौसन के पुत्र कार्ल के साथ हो जाए किंतु बोएंनिंघौसन इसके लिए तैयार नहीं थे। मैलेनी यह बात अच्छी तरह से जानती थीं कि होमियोपैथिक जगत में डॉ. बोएंनिंघौसन का एक प्रभावशाली और प्रतिष्ठित स्थान है इसके साथ ही उनके बेटे कार्ल वॉन बोएंनिंघौसन, मेडिकल कॉलेज से स्नातक थे और इस तरह एक पेशेवर होमियोपैथिक चिकित्सक थे। इस संबंध के जुड़ जाने के बाद सोफी का भविष्य तो सुरक्षित था ही, साथ ही मैलेनी भी अपने चिकित्सा अभ्यास को बेझिझक जारी रख सकती थीं।

 

हैनिमन की मृत्यु के बाद बोएंनिंघौसन ने मैलेनी से छठे ऑर्गेनन के प्रकाशन के बारे में कई बार पूछा था किंतु उन्हें कभी-भी उनसे कोई ठीक जवाब नहीं मिला। डॉ. हैनिमन के सबसे बड़े जीवनीकार और छठे ऑर्गेनन की अमूल्य धरोहर को खोज निकालने वाले डॉ. रिचर्ड हेल अपनी पुस्तक "सैम्युअल हैनिमन - हिज़ लाइफ एंड वर्क" में लिखते हैं कि सन् 1843 में होमियोपैथी के जनक डॉ. क्रिस्चियन फ़्रेडरिक सैम्युअल हैनिमन की मृत्यु के उपरांत उनकी दूसरी पत्नी मैडम मैलेनी डी' हार्वेले का व्यवहार बहुत विचित्र हो गया था।

 

सन् 1856 में, 17-22 जून को म्यूनस्टर की यात्रा के दौरान जब बोएंनिंघौसेन तथा मैडम मैलेनी की भेंट हुई तो बोएंनिंघौसेन ने एक बार फिर लोक-कल्याण का वास्ता देकर मैलेनी से हैनिमन के लेखनों और अन्य साहित्यिक अवशेषों (विशेष रूप से ऑर्गेनन के छठे संस्करण) को प्रकाशित कराने का आग्रह किया जो अबतक अंधेरे में थे। अपने निज़ी स्वार्थों के चलते मैलेनी हर हाल में अपनी पुत्री का विवाह उनके एक पुत्र से कराना चाहतीं थीं इसीलिए उन्होंने बोएंनिंघौसेन से ना सिर्फ़ ऑर्गेनन के छठे संस्करण को जल्द-से-जल्द प्रकाशित करवाने का वादा किया बल्कि वे उन्हें अपने दिवंगत पति की कुछ हस्तलिपियाँ तथा उनके द्वारा तैयार की हुईं कुछ महत्वपूर्ण औषधियों को भी उन्हें प्रदान करने के लिए राज़ी हो गयीं। मैलेनी ने इस बात को स्वीकार किया कि वे तेरह सालों तक इन औषधियों को गुप्त रखें रहीं और आगे भी ऐसा ही करेंगी जबतक कि बोएंनिंघौसेन स्वयं उनका परीक्षण नहीं कर लेते हैं।

 

मैलेनी की इस पेशकश से बोएंनिंघौसेन बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने उत्तेजित होकर 31 जुलाई 1856 को वेस्टफेलिया में आयोजित राइनलैंड के होमियोपैथिक चिकित्सकों की वार्षिक बैठक में मैडम मैलेनी के साथ हुई अपनी वार्तालाप का सार्वजनिक रूप से उल्लेख कर दिया। बोएंनिंघौसेन को सूचित किए बग़ैर इस बात को 29 अगस्त 1856 को “ऑल्गिमाइन होमियोपैथिक ज़ाइटंग” में प्रकाशित कर दिया गया। इस तरह की सार्वजनिक घोषणा ने दोनों के बीच भ्रम और गलतफहमी का रूप ले लिया जिससे मैलेनी बहुत आहत हुईं और उन्होंने क्रुद्ध होकर 8 सितंबर 1856 को बड़ी प्रचण्डता और बेअदबी के साथ बोएंनिंघौसेन को पत्र लिखकर फटकार लगाई। फिर भी बोएंनिंघौसेन को पूर्ण विश्वास था कि हैनिमन की साहित्यिक विरासत बहुत जल्द प्रकाशन में आएगी।

 

इन दोनों के बीच की गलतफहमी के बावजूद जुलाई 1857 में सोफी हैनिमन और कार्ल बोएंनिंघौसेन का विवाह संपन्न हुआ। नव-विवाहित जोड़ा मैलेनी के साथ ही उनके घर पर रहने लगा और इस तरह निश्चिंत होकर मैलेनी ने कार्ल बोएंनिंघौसेन की आड़ में अपनी मेडिकल प्रॅक्टीस को जारी रखा। शीघ्र ही यह भी स्पष्ट हो गया कि मैडम मैलेनी एक बार फिर अपने किए हुए वादे से मुकर गयी थीं। इसके बाद न तो ऑर्गेनन के छठे संस्करण का कुछ पता चला और न ही बोएंनिंघौसेन को किसी औषधि का कोई नमूना ही प्राप्त हुआ। मैलेनी ने उन्हें हैनिमन के “सिक रजिस्टरों” से केवल कुछ बेमेल और क्रमरहित पन्ने ही भेजे जिससे वे अपने मित्रों के बीच उपहास के पात्र बने। शायद अपने किए हुए वादे से छुटकारा पाने की यह उनकी एक सुनियोजित विधि थी। अफ़सोस है कि 26 जनवरी 1864 को बोएंनिंघौसेन की मृत्यु हो गयी और उनके जीवन काल में छठे ऑर्गेनन का प्रकाशन संभव न हो सका।


वर्ष 1858 के बाद से, एक लंबी अवधि तक मैडम मैलेनी का कोई सार्वजनिक जिक्र नहीं हुआ। वर्ष 1865 में एक बार फिर उनका नाम प्रकाश में आया जब जर्मनी के एक डॉ. लटज़ (Dr. Lutze) द्वारा "ऑर्गेनन" के छठे संस्करण के प्रकाशन की घोषणा हुई। सार्वजनिक रूप से कहा गया कि हैनिमन साहब के पौत्र डॉ. सुस्स-हैनिमन द्वारा ऑर्गेनन का “संशोधित एवं वृहद्” (improved and enlarged) छठा संस्करण प्रकाशित होने जा रहा है। इसे अपने अधिकारों का हनन जानकार मैलेनी तुरंत हरकत में आईं और उन्होंने लिपज़िग में इसके अवैध प्रकाशकों को गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि इसका प्रकाशन केवल और केवल उनका अधिकार है और यदि किसी ने इसका अवैध प्रकाशन करने की कोशिश की तो वे इसके विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई करेंगी। उन्होंने न सिर्फ़ इसके प्रकाशकों को पत्र लिखकर चेताया बल्कि "ऑल्गिमाइन होमियोपैथिक ज़ाइटंग" में उनके नाम एक सार्वजनिक पत्र को भी प्रकाशित करवाया। उन्होंने अपने इस पत्र में डॉ. सुस्स-हैनिमन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि डॉ. सुस्स-हैनिमन बहुत छोटी-उम्र में और केवल कुछ अवसरों पर ही अपने नाना से मिले हैं तब यह कैसे संभव है कि उनके पास इसके कुछ मूल दस्तावेज़ उपलब्ध हों। अतः सिद्ध है कि केवल उनके पास ही ऑर्गेनन के असली दस्तावेज़ मौजूद हैं जिनके प्रकाशन की व्यवस्था वे जल्द से जल्द करेंगी।


वास्तव में यह डॉ. सुस्स-हैनिमन द्वारा रचित मैडम मैलेनी को उकसाने का एक प्रयास मात्र था जो काफ़ी हद तक सफल भी रहा था। दरअसल उनका इरादा ऑर्गेनन के पाँचवे संस्करण के पुनर्प्रकाशन का था किंतु उन्होंने घोषणा इसके छठे संस्करण के प्रकाशन की करके एक निपुण चाल चली थी। डॉ. सुस्स-हैनिमन के इस कृत्य से मैडम मैलेनी आग बाबूला हो गयीं और आनन-फानन में उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर लिया कि ऑर्गेनन के छठे संस्करण के सभी दस्तावेज़ उनके पास हैं और साथ ही घबराकर उन्होंने यह घोषणा भी कर दी कि वे बहुत जल्द इसके प्रकाशन की व्यवस्था कर रहीं हैं। डॉ. सुस्स-हैनिमन ने ऐसा इसीलिए किया था क्योंकि हैनिमन के मरणोपरांत मैलेनी एक काफ़ी लंबे अरसे (लगभग बीस वर्ष) से सभी हस्तलिपियों को अपने पास गुप्त रखें रहीं और उनकी इस चुप्पी से स्पष्ट था कि उनका इरादा इनके प्रकाशन का नहीं था। डॉ. सुस्स-हैनिमन ने इस तथ्य का खुलासा मैडम मैलेनी को लिखे अपने जवाबी पत्र में किया था जिसे ब्रिटिश जर्नल ऑफ होमियोपैथी (1865, Vol. 23, page 422) में प्रकाशित किया गया। पत्र में उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कोथेन में बसी उनकी मौसी लुईस के पास भी हैनिमन की कुछ साहित्यिक विरासत है जिनमें ऑर्गेनन का पाँचवा संस्करण भी शामिल है और अब ये सभी दस्तावेज़ क़ानूनी रूप से उनके अधिकार में हैं। अतः वे ऑर्गेनन के पाँचवे संस्करण के पुनर्प्रकाशन के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। हालाँकि इस घोषणा के बाद भी डॉ. सुस्स-हैनिमन ने पाँचवे ऑर्गेनन का पुनर्प्रकाशन नहीं किया था किंतु डॉ. लटज़ ने 1865 में पाँचवे ऑर्गेनन के कुछ हिस्सों को संशोधित करके एक संस्करण ज़रूर प्रकाशित किया था जिसे “सातवां ऑर्गेनन” भी कहा गया किन्तु इस परिवर्तित संस्करण को दुनिया-भर के होमियोपैथ्स ने किन्हीं कारणों से नकार दिया था।

वहीं दूसरी ओर अब जबकि मैलेनी ने "ऑर्गेनन" के छठे संस्करण के प्रकाशन की सार्वजनिक घोषणा कर दी थी तब उन्होंने इसे एक भारी कीमत में बेच देने का निर्णय लिया। इस मामले में मैडम मैलेनी पूरी तरह से एक व्यवसायिक महिला थीं। वे लगातार लगभग एक दशक तक, एक मोटी रकम में इसे अंग्रेजी और अमेरिकी होमियोपैथिक चिकित्सकों को बेचने की पेशकश करतीं रहीं। दुनिया-भर के बहुत से होमियोपैथिक चिकित्सक ऑर्गेनन के छठे संस्करण को प्राप्त करने का ज़ोरदार प्रयास करते रहे किंतु मैलेनी के पत्रों से स्पष्ट है कि वे इसके लिए एक मोटी रकम के इंतेज़ार में थीं। इसे लेकर 1865 में भी वे फिलाडेल्फिया के हैनिमन कॉलेज के साथ समझौता वार्ता में व्यस्त थीं। उस समय हैनिमन कॉलेज के शिक्षण स्टाफ में डॉ. कॉन्स्टेंटाईन हैरिंग, डॉ. लिप्पे और डॉ. राऊ जैसे दिग्गज शामिल थे। 1865 में डॉ. कॉन्स्टेंटाईन हैरिंग से चर्चाओं के दौरान उन्होंने लिखा था कि वे स्वयं अपनी देखरेख में इसके नवीन जर्मन संस्करण को बनाने की योजना बना रहीं हैं क्योंकि इसके मूल दस्तावेज़ अच्छी स्थिति में नहीं हैं और जैसे ही इनकी प्रति तैयार होती है वैसे ही वे जल्द से जल्द इसे उनके पास भेजने की व्यवस्था करेंगी और यही छठे ऑर्गेनन के अमेरिकी संस्करण का आधार होगा। डॉ. हैरिंग छठे ऑर्गेनन का अँग्रेज़ी में अनुवाद करके उसे प्रकाशित करना चाहते थे किंतु यह संभव नहीं हो सका क्योंकि इस समझौता के अंत में मैडम हैनिमन ने उनसे एक असाधारण राशि (50,000 डॉलर) की माँग कर डाली। उस समय के पचास हज़ार डॉलर्स आज (2021) के हिसाब से लगभग आठ सौ उनतालीस हज़ार डॉलर्स ($839,162.58) यानी भारतीय रुपयों में लगभग छः करोड़ तीस लाख (6,30,46,284.64/-) रुपये के बराबर होते हैं। कई लोगों के मिलकर प्रयास करने के बावजूद वे लोग कभी इतनी बड़ी धनराशि की व्यवस्था नहीं कर सके।

बाद में इस बारे में उनकी चर्चा अमेरिकी चिकित्सक डॉ. डनहम के साथ भी हुई जो डॉ. हैनिमन के सभी मरणोपरांत लेखनों को खरीदना चाहते थे किंतु इस दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद वर्ष 1877 में लंदन स्कूल ऑफ होमियोपैथी की तरफ से एक डॉ. बेय्स (Dr. Bayes) ने मैडम मैलेनी को विशेष रूप से "ऑर्गेनन" के छठे संस्करण और सिक रजिस्टरों को खरीदने का एक अच्छा प्रस्ताव दिया किंतु वे भी उन्हें संतुष्ट कर पाने में नाकामयाब हुए। डॉ. डनहम, डॉ. बेय्स, डॉ. विल्सन और डॉ. कैम्पबेल के साथ लंबे समय तक बातचीत का सिलसिला चलता रहा किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। इन डॉक्टरों में से एक ने मैडम मैलेनी को एक उर्जावान व्यापारिक महिला के रूप में वर्णित किया था।

या तो मैलेनी नहीं चाहतीं थीं कि अन्य होमियोपैथ्स द्वारा यह संस्करण प्रकाशित हो और इसीलिए उन्होंने उनसे इस तरह की भारी राशि की माँग की जिसका भुगतान करने में वे असमर्थ हों अथवा वे होमियोपैथ्स की आर्थिक स्थिति का ठीक-ठीक अनुमान लगाने में नाकामयाब रहीं थीं। वजह जो भी हो परंतु मैलेनी लगातार ये दलील देती रहीं कि उन्होंने अपने दिवगंत पति को यह वचन दिया था कि वे उनके सभी कार्यों की प्रतियों की स्वयं देखरेख करेंगीं ताकि उनके साथ कोई दुर्भावनापूर्ण छेड़छाड़ न कर सके। विशेष रूप से वे "ऑर्गेनन" के छठे संस्करण के प्रकाशन कार्य को अपनी "सबसे हार्दिक इच्छा" कहकर बार-बार इस बात पर बल देती रहीं कि इसमें "मानवता के लिए अकूत भण्डार भरे पड़े हैं” और इसीलिए वे सही समय आने का इंतेज़ार करेंगी जबतक कि उनके समकालीनों का विद्वेष थम न जाए। लेकिन इसके ठीक विपरीत उन्होंने इसके प्रकाशन के एक से एक प्रस्तावों को सिर्फ़ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि वे उन्हें उनके मुँहमाँगे मूल्य का भुगतान नहीं कर पाए।

1870 के दशक में फ्रेंको-प्रशिया युद्ध के चलते परिस्थितियां कठिन होती गयीं और इसी कारण उनकी दत्तक पुत्री के जर्मन पति कार्ल वॉन बोएंनिंघौसेन ने अब जल्द से जल्द पैरिस को छोड़ देना ही उचित समझा। वे अपने देश जर्मनी के वेस्टफेलिया में वापस लौट आए जहाँ वे स्थायी रूप से अपनी पत्नी के साथ बस गये। सुरक्षा की दृष्टि से हैनिमन की समस्त हस्तलिपियों को भी वे यहाँ अपने साथ वेस्टफेलिया में डच की सीमा पर बसे दारूप ले आए थे। मैलेनी भी उनके साथ दारूप गयी थीं और कुछ समय वहां रुकने के बाद वे वापस पैरिस लौट आईं किन्तु हैनिमन की समस्त साहित्यिक विरासत दारूप में उनकी पुत्री के ही अधिकृत रही।

 

 

मैलेनी के जीवन के अंतिम दशक में आख़िर उन्हें “एलेनटाउन अकादमी” द्वारा डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया गया और इसके साथ ही वे फ्रांस तथा विश्व की प्रथम महिला होमियोपैथिक चिकित्सक बन गयी थीं। 27 मई 1878 को लगभग अठहत्तर वर्ष की उम्र में मैडम मैलेनी हैनिमन का निधन हो गया।

 

ऑर्गेनन के छठे संस्करण के अलावा हैनिमन की साहित्यिक विरासत में उनकी केसबूक्स, उनकी रेपर्टरी, छह विविध लेखन, एक बड़ी संख्या में डॉ. स्टाफ़ तथा अन्य डॉक्टरों के पत्र, रोगियों के साथ उनके पत्राचार और डेविड द्वारा बनाई गयी उनकी एक अर्धप्रतिमा शामिल थी जो अब सोफी बोएंनिंघौसेन को विरासत में मिली थी। 1878 में सोफी ने डॉ. विल्सन, डॉ. कैम्पबेल और डॉ. ग्वेर्नसे के साथ वार्ता को जारी रखा। छठे ऑर्गेनन की मूल पांडुलिपि से एक विश्वसनीय प्रतिलिपि बनाने के क्रम में उन्होंने $25,000 तथा इसकी सभी रॉयलटीस की मांग की। पच्चीस हज़ार डॉलर्स आज के सन्दर्भ में लगभग पांच करोड़ तीन लाख पचहत्तर हज़ार भारतीय रुपये के बराबर होते हैं। यह भी एक बहुत बड़ी धनराशि थी और शायद इसीलिए 1880 के बाद से इस संबंध में उनके साथ सभी वार्तायें समाप्त हो गयी थीं। अपनी माँ मैलेनी की ही तरह सोफी भी अपनी भारी माँगों पर अड़ी रहीं और इस तरह दुर्भाग्य से छठे ऑर्गेनन के प्रति होमियोपैथ्स की रूचि निरंतर घटती चली गई।



डॉ. रिचर्ड हेल ने अपनी पुस्तक "सैम्युअल हैनिमन - हिज़ लाइफ एंड वर्क" में इस विषय को लेकर कई जगहों पर मैडम मैलेनी की कड़े शब्दों में निंदा की है। सत्रह साल के बाद सन् 1897 में इस बार डॉ. रिचर्ड हेल ने अपने मित्र डॉ. विलियम बोरिक के साथ मिलकर इसके प्रकाशन का बीड़ा उठाया और इस तरह उनके तत्वाधान में एक बार पुनः मैडम सोफी बोएंनिंघौसेन से इस संबंध में चर्चाओं का दौर शुरू हुआ। किंतु दुर्भाग्य कि जबतक डॉ. हेल उनसे भेंट करने उनके घर दारूप पहुँचे तबतक सोफी की मृत्यु को लगभग एक वर्ष बीत चुका था। जब सोफी की मृत्यु हो गई तब छठे ऑर्गेनन का स्वामित्व उसके पति कार्ल को पारित हो गया। डॉ. हेल ने उसके प्रकाशन को लेकर कार्ल बोएंनिंघौसेन को प्रस्ताव देने की कोशिश की किंतु उनसे भी इस बारे में कोई बात नहीं बन सकी और सन् 1902 में उनकी भी मृत्यु हो गयी।

डॉ. हैनिमन की समस्त साहित्यिक विरासत अब दारूप में उनके वंशजों के संरक्षण में आ गयी थी। इसी क्रम में सन् 1906 में डॉ. रिचर्ड हेल और डॉ. विलियम बोरिक ने वेस्टफेलिया में उनके घर का दौरा किया किंतु अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहे। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के हस्तक्षेप के कारण बोएंनिंघौसेन परिवार से उनकी भेंट प्रायः ही हो सकी किंतु फिर भी उन्होंने पत्रों के माध्यम से उनसे अपना हठपूर्ण आग्रह जारी रखा और आख़िर तेईस सालों के लंबे इंतेज़ार के बाद वर्ष 1920 के अंत में उनकी मेहनत रंग लाई जब डॉ. विलियम बोरिक के साथ मिलकर $1000 का भुगतान करने के बाद वे छठे ऑर्गेनन की पांडुलिपि के साथ उनकी समस्त साहित्यिक विरासत को खरीदने में सफल हुए। आज के भारतीय रुपयों में लगभग दस लाख सताइस हज़ार रुपये (10,27,654/-) के बराबर।

प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत जर्मनी की क्रांतिकारी गतिविधियों के बीच डॉ. रिचर्ड हेल, हैनिमन की इस महान साहित्यिक विरासत को दारूप से अपने साथ सुरक्षित स्टटगर्ट लाने में सफल हुए। सन् 1921 में छठे ऑर्गेनन के पहले जर्मन संस्करण के प्रकाशन के साथ डॉ. हेल ने हैनिमन साहब की अंतिम इच्छा को पूरा किया। वहीं डॉ. विलियम बोरिक जो सैन फ्रेंनसिसको की यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर थे, उन्होंने मूल प्रति से इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और इस तरह अपने पूर्ण होने के लगभग अस्सी साल के बाद छठे ऑर्गेनन का प्रथम अंग्रेजी संस्करण भी अमेरिका की प्रेस द्वारा दिसंबर 1921 में प्रकाशित हुआ।

गौरतलब है कि छठे ऑर्गेनन का प्रकाशन तब हुआ जब सन् 1833 में प्रकाशित ऑर्गेनन के पांचवें संस्करण को अठासी साल बीत चुके थे तथा तबतक यह वैश्विक स्तर पर “होमियोपैथी की बाइबिल” के रूप में स्थापित हो चुका था। इसी बीच में डॉ. जेम्स टायलर केंट (1849-1916) जैसे होमियोपैथ्स हुए जिन्होंने अपने कार्यों के द्वारा होमियोपैथिक जगत में एक प्रभावी छाप छोड़ी थी। इन्हीं कारणों से इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि ऑर्गेनन का यह छठा संस्करण यद्यपि 1921 में सार्वजनिक रूप से जर्मन और अंग्रेजी में उपलब्ध था किंतु फिर भी इसने LM पोटेंसीज़् के प्रति होमियोपैथ्स में ज्यादा रुचि उत्पन्न नहीं की। यहाँ तक कि स्वयं डॉ. विलियम बोरिक द्वारा इसका अँग्रेज़ी में प्रकाशन करने के बाद भी उनकी फार्मेसी ‘बोरिक आंड टेफल’ ने इन नवीन पोटेंसीज़् का निर्माण नहीं किया। दुर्भाग्य से उत्साही होमियोपैथ्स की एक पूरी पीढ़ी इससे अछूती रह गयी और एक लंबे समय तक ज़्यादातर होमियोपैथ्स ने इन पोटेंसीज़् का परीक्षण करने से भी परहेज़ किया।

1950 के दशक में विशेषकर तीन होमियोपैथ्स के कारण एक बार पुनः चिकित्सकों में इनके प्रति रुचि जाग्रत हुई। ये तीन होमियोपैथ्स थे फ्रांस के डॉ. पाहुद, फ्रांस के ही डॉ. ए. वोएगेली और स्विट्जरलैंड के डॉ. पियरे जोसेफ शिमिड। इनके कार्यों ने एक बार फिर इन पोटेंसीज़् के उपयोग के लिए एक मंच तैयार किया। हालाँकि अभी भी समग्र होमियोपैथिक जगत में इनका अपेक्षाकृत कम उपयोग होता है किंतु फिर भी पिछले कुछ वर्षों में छठे ऑर्गेनन और LM पोटेंसीज़् को लेकर होमियोपैथिक चिकित्सकों में पुनः जागृति आई है।

हम सभी डॉ. हेल तथा डॉ. विलियम बोरिक के प्रति बहुत आभारी हैं क्योंकि यह उन्हीं के अथक प्रयासों का नतीज़ा था कि हम छठे ऑर्गेनन के रूप में डॉ. हैनिमन की इस अमूल्य साहित्यिक निधि से रुबरू हो सके। आज वर्ष 2021 में छठे ऑर्गेनन के प्रकाशन की 100 वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में निश्चित ही हम सभी होमियोपैथ्स गौरवान्वित, हर्षित एवं उत्साहित हैं। साथ ही हम संकल्प लेते हैं कि होमियोपैथी रुपी, डॉ. हैनिमन की इस महान सम्पदा के सम्मान एवं उत्थान के लिए हम निरंतर प्रयासरत रहेंगे।