अपने जन्म की पहली ही सदी में होमियोपैथी ने ऐसी ऊँचाइयाँ छू ली थीं कि आज उस इतिहास पर विश्वास करना भी कठिन लगता जब 19वीं शताब्दी में भी आधुनिक, सुव्यवस्थित और अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होम्योपैथिक अस्पताल हुआ करते थे।



चाहे ब्रिटेन का रॉयल लंदन होम्योपैथिक अस्पताल हो, लिवरपूल होम्योपैथिक अस्पताल, ग्लासगो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, या फिर अमेरिका के वॉशिंगटन डी.सी., न्यूयॉर्क, शिकागो, मिशिगन, मैसाचुसेट्स और अन्य प्रमुख शहरों में स्थापित सौ से अधिक होम्योपैथिक अस्पताल हों, सभी उत्कृष्ट चिकित्सा के पैमाने पर खरे उतर रहे थे। इतना ही नहीं, होम्योपैथिक नर्सिंग कॉलेज भी स्थापित किए जा रहे थे, जहाँ प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी तैयार किए जाते थे। उस समय होमियोपैथी केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि एक सशक्त चिकित्सा आन्दोलन बन चुकी थी। उस दौर में इंग्लैंड की महारानी से लेकर अनेक राष्ट्रपतियों, राजनेताओं, उद्योगपतियों और समाज की प्रतिष्ठित हस्तियों तकअसंख्य प्रभावशाली लोग होमियोपैथी का भरपूर उपयोग करते थे। उनमें से अनेक के अपने व्यक्तिगत होम्योपैथिक चिकित्सक हुआ करते थे। ज़रा कल्पना कीजिए, यदि वे अस्पताल, शिक्षण संस्थान और अनुसंधान केंद्र आज भी उसी प्रकार अस्तित्व में बने रहते, तो होमियोपैथी आज कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी होती..!


लेकिन तब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि जो होमियोपैथी 19वीं शताब्दी में इतनी तेज़ी से विकसित हो रही थी, उसके साथ ऐसा क्या हुआ कि 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक उसका पतन होना शुरू हो गया? ऐसा क्या बदला कि धीरे-धीरे वित्तीय सहायता कम होने लगी, अस्पताल एक-एक करके बंद होते चले गए, और प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते होमियोपैथी की दुनिया ही बदल गई? आखिर वह कौन-से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और चिकित्सीय कारण थे जिन्होंने एक समय की इतनी प्रभावशाली चिकित्सा प्रणाली को हाशिए पर पहुँचा दिया?

 

तो चलिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं क्योंकि इसे समझे बिना हम होमियोपैथी के वर्तमान और भविष्य को पूरी तरह से नहीं समझ सकते। वास्तव में, इस विषय को समझने के लिए हमें इतिहास के कुछ ऐसे अध्यायों से होकर गुजरना पड़ेगा जो आज भी बहस, विवाद और अनेक प्रश्नों का विषय बने हुए हैं। बिना उस पृष्ठभूमि को समझे हम शायद मूल मुद्दे तक नहीं पहुँच पाएँगे।


तो ये बात है कुछ ऐसे लोगों की जिनके बारे में ज़्यादा पढ़ना या रिसर्च करना या फिर बोलना भी काफी हद्द तक वर्जित माना जाता है। मैं बात कर रही हूँ उस डार्क वर्ल्ड की जिससे ज़्यादातर लोग अनजान रहते हैं। उस काली दुनिया को कुछ लोग डार्क वर्ल्ड, या डीप स्टेट या इल्लुमिनाति के नाम से जानते हैं। ये दरअसल उन 13 प्रभावशाली परिवारों का समूह है जो देखा जाए तो इस पूरी दुनिया को चलते हैं।

 

कुछ कांस्पीरेसी थ्योरीस के अनुसार, दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और मीडिया पर इन्हीं 13 चुनिंदा शक्तिशाली परिवारों और समूहों का गहरा प्रभाव रहा है। इन कांस्पीरेसी थ्योरीस में अक्सर यह दावा किया जाता है कि दुनिया की अधिकांश संपत्ति और प्रभाव इन्हीं कुछ सीमित हाथों में केंद्रित है, जो परदे के पीछे से वैश्विक नीतियों को भी प्रभावित करते हैं और इसीलिए वो बहुत सशक्त और खतरनाक लोग हैं।


परदे के पीछे से इन्हीं कुछ उद्योगपतियों और राजघरानों ने राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और आर्थिक नीतियों पर अत्यंत गहरा प्रभाव डाला है। ये लोग नीतियां ही ऐसी बनाते हैं जिनसे उनका व्यापार बिना कुछ किये ही एक ऑटो-मोड पर चलता रहे और ये लोग मोटा मुनाफा कमाते रहे। इसी कारण से ये लोग नहीं चाहते कि दुनिया उन्हें वित्तीय लाभ दिए बग़ैर कुछ भी काम करे. उनकी इसी मंशा का शिकार एक ज़माने में होमियोपैथी भी हुई थी।

 

उन्हीं 13 प्रभावशाली परिवारों में एक नाम है रॉकफेलर परिवार का, जिसने विशेष रूप से अमेरिका की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परिवार की कहानी मुख्य रूप से जॉन डेवीसन रॉकफेलर (1839-1937) से शुरू होती है। 1839 में जन्मे जॉन डी. रॉकफेलर को आधुनिक इतिहास के सबसे धनी व्यक्तियों में गिना जाता है। उन्हें आधुनिक इतिहास का पहला अरबपति भी माना जाता है। तेल उद्योग में उनके विशाल साम्राज्य ने केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, बल्कि आगे चलकर शिक्षा, चिकित्सा और परोपकार के क्षेत्र में भी उनके परिवार की गहरी छाप छोड़ी।

 

तो बात उस जामने की है जब बिजली नहीं थी तो अमेरिका के लोग दिया जलाने के लिए व्हेल मछली के फैट से निकला तेल उपयोग करते थे। निस्संदेह वो आसानी से उपलब्ध नहीं था और महँगा भी था तो तब इन्होंने क्रूड आयल (discovered in 1859) को रिफाइन करके उसको एक विकल्प के तौर पर पेश किया और लोगों को रेलवे के माध्यम से उपलब्ध करवा कर बहुत मोटा मुनाफा कमाया। तो इस तरह इन्होंने 1870 में अमेरिका में अपनी स्टैण्डर्ड आयल कंपनी की नीव रखी। भ्रष्टाचार से इन्होंने अपने सारे प्रतियोगियों को ख़तम कर दिया और उनकी भी कम्पनी या तो खरीद ली या तो बर्बाद कर दी। तो इस तरीके से आयल पर इन का एकाधिकार हो गया। और ये दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करते चले गए और आयल के प्राकृतिक संसाधन के दम पर पैसा कमाते चले गए और इतना अमीर होने के कारण धीरे-धीरे अमेरिकी सरकार भी एक तरीके से इनके प्रभाव में आती चली गयी। जे. डी. रॉकफेलर की अगली पीढ़ियों ने भी अमेरिका को अपने इशारों पर नचाया इनकी पांचवी पीढ़ी के वंशज आज भी हमारे बीच रहते हैं और वे भी इतने ही प्रभावशाली हैं

 

वहीं अगर हम अमेरिका में होमियोपैथी के इतिहास को देखें, तो 1825 के आसपास से ही होमियोपैथी वहाँ तेज़ी से आगे बढ़ने लगी थी। कुछ ही दशकों में इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि 1844 में “American Institute of Homeopathy (AIH)” की स्थापना हुई, जिसे आज भी अमेरिका का सबसे पुराना राष्ट्रीय चिकित्सा संगठन माना जाता है।

 

चूँकि यह अमेरिका की पहली राष्ट्रीय मेडिकल एसोसिएशन थी, इसलिए कहा जाता है कि इसकी बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित होकर पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों ने मात्र तीन वर्ष बाद, 1847 ही, “American Medical Association (AMA)” का गठन किया। कई इतिहासकारों का मानना है कि AMA के शुरुआती वर्षों में होमियोपैथी का विरोध करना ही उसकी प्रमुख नीतियों में शामिल था।

 

लेकिन विरोध के बावजूद होमियोपैथी का विस्तार लगातार जारी रहा। वर्ष 1900 तक अमेरिका में 22 होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, लगभग 100 होम्योपैथिक अस्पताल, 1000 से अधिक होम्योपैथिक डिस्पेंसरी और होमियोपैथी को समर्पित 29 अलग-अलग पत्रिकाएँ स्थापित हो चुकी थीं। उस समय अमेरिका के लगभग 20 प्रतिशत चिकित्सक होमियोपैथी का अभ्यास कर रहे थे। ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि 1829 से 1869 के बीच न्यूयॉर्क में होम्योपैथिक चिकित्सकों की संख्या लगभग हर पाँच वर्ष में दोगुनी हो जाती थी।

 

होमियोपैथ्स केवल संक्रामक रोगों के उपचार तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे अनेक गंभीर और दीर्घकालिक रोगों का भी उपचार कर रहे थे। उस समय के कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि चूँकि होमियोपैथिक उपचार कराने वाले रोगी ज़्यादा समय तक जीवित रहते थे इसलिए कुछ जीवन बीमा कंपनियाँ तो होमियोपैथी से उपचार कराने वाले रोगियों को 10 प्रतिशत तक की छूट भी देती थीं…!

 

दरअसल उस दौर का अमेरिका चिकित्सा पद्धतियों की दृष्टि से अत्यंत विविध था। होमियोपैथी के अतिरिक्त Naturopathy, Herbal Medicine, Holistic Healing, Natural Healing तथा Native American की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ भी व्यापक रूप से प्रचलित थीं। कुछ स्रोतों के अनुसार, 1900 के आसपास अमेरिका के आधे से अधिक चिकित्सक किसी-न-किसी रूप में इन उपचार प्रणालियों का उपयोग करते थे और नि:संदेह होमियोपैथी इन सब में सबसे ज़्यादा प्रचलित चिकित्सा पद्धति हुआ करती थी।

 

होमियोपैथी को केवल आम जनता का ही नहीं, बल्कि अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों का भी समर्थन प्राप्त था। उस युग में अमेरिका के अनेक प्रभावशाली उद्योगपति, लेखक, राजनेता और सामाजिक नेता होमियोपैथी को गंभीरता से लेते थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीसवीं सदी के आरंभ तक होमियोपैथी अमेरिका की सबसे प्रभावशाली चिकित्सा प्रणालियों में से एक बन चुकी थी। प्रसिद्ध लेखक “Mark Twain” ने 1890 में “Harper’s Magazine” में प्रकाशित एक लेख में होमियोपैथी की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि होमियोपैथी के आगमन ने पारंपरिक चिकित्सा को स्वयं को बेहतर बनाने के लिए मजबूर किया।

 

दिलचस्प बात यह है कि इसके समर्थकों में एक अत्यंत चर्चित नाम जॉन डेवीसन रॉकफेलर का भी था। कहा जाता है कि वे स्वयं जीवन-भर होमियोपैथी को अपनाए रहे। विभिन्न विवरणों में उल्लेख मिलता है कि उनके निजी होमियोपैथिक चिकित्सकों की संख्या तीन से पाँच के बीच थी, और उनमें से एक चिकित्सक तो अक्सर उनकी यात्राओं में भी साथ रहता था। होमियोपैथी के विषय में रॉकफेलर का एक प्रसिद्ध कथन भी प्रचलित है: "Homeopathy is a progressive and aggressive step in medicine."


तो खुद तो वो होमियोपैथी का उपयोग करते थे लेकिन बाकि सबको ये बीमार क्यों रखना चाहते थे? क्या यही इनका बिज़नेस मॉडल था? 

 

दरअसल भ्रष्टाचार से अँधा-धुंध पैसा कमाने, और आयल पर अपना एकाधिकार कायम करने के बाद रॉकेफिलर्स ने अपनी बिगड़ी हुई छवि सुधारने के लिए बेहिसाब दान करना भी शुरू किया क्योंकि अब उनकी नज़र अमेरिका की सत्ता पर और वैश्विक शक्ति बनने की थी। तभी उनकी नज़र एक ऐसी चीज़ पर पड़ी जिससे दुनिया का हर इंसान जुड़ा है और वो है स्वास्थ्य क्षेत्र यानि हेल्थ सेक्टर। रॉकफेलर को इसमें दुनिया का सबसे बड़ा बिज़नेस नज़र आया। आज जिसे हम मॉडर्न मेडिसिन या बिग फार्मा का नेक्सस कहते हैं उसकी नीव रखने में इसी परिवार का हाथ था।

 

दान-अनुदान देने की आड़ में रॉकेफिलर्स ने नए अनुसंधान की भी फंडिंग शुरू की ताकि ये और पैसा कमाने के नए-नए रास्ते ढूंढते रहे। इसी मंशा से इन्होंनेRockefeller Institute for Medical Research” (1901) की नीव रखी जो हर साल करोड़ों डॉलर्स की फंडिंग देता था नए अनुसंधान के लिए। जब वैज्ञानिकों ने पेट्रोलियम से अलग-अलग केमिकलस बनाने का तरीका खोज लिया जिसे दवाइयों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता था, तब रॉकफेलर को धीरे-धीरे एक बात अच्छी तरह से समझ गयी थी कि पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल दवाएँ बनाने में किया जा सकता था।

 

जाहिर तौर पर हम प्राकृतिक दवाओं जैसे कि प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का होमियोपैथी दवाओं का या धूप का पेटेंट नहीं करवा सकते, लेकिन हम कैमिकल्स को दवाओं के रूप में पेटेंट करवा सकते हैं। ये बात जब इन्हें समझ में आयी तो तब उन्हें फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी हो गई। और फिर उन्होंने और ज़्यादा फंडिंग शुरू की ऐसी रिसर्चेस की जो कैमिकल दवाओं को बढ़ावा देती थीं और प्राकृतिक दवाओं और ख़ास तौर पर होमियोपैथी को अवैज्ञानिक बताती थीं क्योंकि होमियोपैथी उस समय बहुत ज़्यादा प्रचलित हुआ करती थी। तो उन्होंने प्रचार करना शुरू किया कि होमियोपैथी तो प्लेसिबो इफ़ेक्ट मात्र है और इसमें कुछ भी वैज्ञानिक नहीं है।

 

इन्हीं सब रिसर्चेस का जो अंतिम परिणाम था उसको बोलते हैं 'फ्लेक्सनर रिपोर्ट' (Flexner Report of 1910) स्पष्ट रूप से रॉकफेलर फाउंडेशन ने ही कार्नेगी फाउंडेशन के साथ मिलकर फ्लेक्सनर रिपोर्ट को फंड किया, ताकि उस समय जो 1000 से ज़्यादा प्रचलित पारंपरिक उपचार की प्राकृतिक प्रणालियाँ हुआ करती थीं (जिनमें होमियोपैथी सबसे ज़्यादा लोकप्रिय थी), उन सबको एक साथ अवैज्ञानिक घोषित करने का काम इस फ्लेक्सनर रिपोर्ट ने किया था जो की कथित तौर पर इसका मूल रूप से उद्देश्य ही था।


 

फ्लेक्सनर रिपोर्ट 1910 में प्रथम ऑरगेनन (1810) के ठीक 100 साल के बाद आयी थी और इसे मेडिकल के इतिहास में एक लैंडमार्क के तौर पर देखा जाता है कि इसके पहले होमियोपैथी और पारम्परिक चिकित्सा की स्थिति कुछ और थी और इसके आने के बाद इनकी स्थिति कुछ और हो गयी थी। उनकी तस्वीर बदलती चली गयी और एक रणनैतिक पतन हुआ क्योंकि नीति निर्माताओं ने नीतियां ही ऐसी बनायीं थी की फंड्स के अभाव में उसका उत्थान संभव ही नहीं हो पाया और एक-एक करके होमियोपैथी के बेहतरीन से बेहतरीन हॉस्पिटल्स बंद होते चले गए।

 

जाहिर तौर पर क्योंकि होमियोपैथी और प्रचलित पारंपरिक प्रणालियों में सेहत / हीलिंग थी पर पैसा नहीं था इसीलिए वो बेहतर बिज़नेस मॉडल्स नहीं थे और एलॉपैथी जिसे आज हम मॉडर्न मेडिसिन कहते हैं ये एक अच्छा लाभदायक व्यापार था क्योंकि ये पेट्रोकेमिकल आधारित था तो इसीलिए इसको इसी तरह से विकिसित किया गया।

 

फ्लेक्सनर रिपोर्ट के आधार पर होमियोपैथी को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे ये पूरी तरह से अवैज्ञानिक थी और इसीलिए पनप नहीं पायी। और ये सिलसिला आज भी जारी है। आज भी कुछ बिकाऊ चिकित्सकों को खरीदकर या फिर कुछ रिसर्चेस को फण्ड करके होमियोपैथी की छवि को ख़राब किया जाता है। बार-बार वही झूठे सामरिक हमले किये जाते हैं। ये सब सुव्यवस्थित, सुनियोजित और वित्त-पोषित होता है। ये लोग आज भी प्रभावशाली हैं इसीलिए इतने सकारात्मक अनुसंधान होने के बावजूद विकिपीडिया पर होमियोपैथी के बारे में पहला वाक्य यही लिखा है कि ये वैकल्पिक उपचार की स्युडो साइंटिफिक प्रणाली है। जोकि सरासर भ्रमित करने वाला है।

 

आप सोचकर देखिये कि जिस होमियोपैथी को ख़तम करने के लिए इन्होंने 100 वर्ष पहले फ्लेक्सेनेर रिपोर्ट निकाली थी वो तो आज भी फल-फूल रही है। क्योंकि ऐसा नहीं है कि होमियोपैथी के पक्ष में सकारात्मक अनुसंधान नहीं हैं या होमियोपैथी काम नहीं करती है। होमियोपैथी के पक्ष में भी कई रिसर्चेस हुई हैं जो ये साबित करती हैं कि ये प्लेसिबो इफ़ेक्ट से कहीं ज़्यादा है। लेकिन ये लोग जाहिर तौर पर ये कभी नहीं मानते। उनकी मजबूरी है क्योंकि वो एक रणनीति के तहत काम कर रहे हैं तो वो मान नहीं सकते। मानने का मतलब है अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। इसीलिए वे ऐसी सकारात्मक अनुसंधान में कोई कोई कमी निकालकर उसे स्वीकार ही नहीं करते। पर समस्या उनकी ये है कि इन रिसर्चेस को ये पूरी तरह से नकार भी नहीं पाते क्योंकि साँच को आँच नहीं।

 

अब ये होमियोपैथी की महानता ही तो है कि इतने प्रहार झेलने के बावजूद आज भी ये टिकी हुई है और मजबूती के साथ टिकी हुई है कि होमियोपैथी आज भी दुनिया की दूसरी सबसे लोकप्रिय चिकित्सा प्रणाली है और ये इसीलिए है क्योंकि सच को दबाया जा सकता है प्रताड़ित किया जा सकता लेकिन ख़तम कैसे करोगे...? होमियोपैथी के सिद्धांत तो प्रकृति में बसे हुए हैंकभी देखा है अंधेरों ने सूरज नहीं उगने दिया..?